Centre Seeks New ‘Cowboys’ to Don Role of Saviours

Published: 24th August 2015 04:19 AM

Last Updated: 24th August 2015 04:19 AM

NEW DELHI: Roadblock is the mother of the BJP-led Central government’s innovation. After deciding to put on hold the proposed national ban on cow slaughter due to political and legal reasons, it is coming up with innovative ways to encourage cow rearing while taking measures to discourage the killing of cows.

Taking the lead in this is the Prime Minister’s Office (PMO). It has asked Minister of Agriculture Radha Mohan Singh and the various ministries, including the Ministry of Health and Family Welfare to come up with “innovative ideas” to make cow rearing a profitable practice. The directive came after the Ministry of Law opposed a national ban on the killing of cows. The ministries have also been asked to think out of the box and do “serious research” to find out more about the productive ways in which cow waste can be used. The ministries are doing exactly that. The Ministry of Agriculture has decided to encourage production and marketing of products made from cow dung and urine. The government will also encourage the marketing of a cleaning liquid made from a mixture of cow urine, neem and a fragrant that can be used instead of phenyl, the ubiquitous cleaning liquid.

“While phenyl made from chemicals is not good for human health, this liquid is 100 per cent natural. Cow urine has inherent medicinal components, which should make it more attractive,” said an official with the ministry.

He said that the product will be available at all Kendriya Bhandars across the country and will be made mandatory in all government spaces. The government also plans to give subsidies to NGOs working in this area.

“Making products from cow urine and cow dung will make cow rearing a more lucrative proposition. The government hopes to dissuade farmers from selling off cows when they become old. It will also help gaushalas across the country,’’ the official added.

While the Ministry of Agriculture is focusing on cow urine, the Ministry of Health and Family Welfare-especially the Department of AYUSH (Ayurveda, Yoga and Naturopathy, Unani, Siddha and Homoeopathy )-is focusing on ‘panchgavya’, a collective name for five products obtained from cows– milk, curd, ghee, urine and dung.

ज्ञापन

संविधान के अनुच्छेद ४८ का स्पष्ट निर्देश है कि यह राज्य का कर्तव्य है कि ‘राज्य अपने पशुधन की रक्षा और संवर्धन करे।‘ अनुच्छेद ५१ का निर्देश है कि ‘हर नागरिक को प्रकृति के सभी अंगों के प्रति दया दिखानी चाहिए और उसकी रक्षा करनी चाहिये।‘ हर कत्लखाना, संविधान के खिलाफ है। आप संविधान के निर्देशों का पालन नहीं करेंगे, तो जनता कैसे आपके निर्देशों का पालन करेगी? भारत में संविधान सर्वोपरि है। संविधान के निर्देशों की अवमानना करने वाले कत्लखाने को आप कैसे चलने दे सकते है?

दिल्ली विश्वविद्यालय के सेवा निवृत्त प्राध्यापक प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ मदन मोहन बजाज ने विश्व के वैज्ञानिकों के समक्ष प्रमाणित किया कि “जीव हत्या जनित पीड़ा तरंगों के कारण, भूकंप, बाढ़, सुखाड़, महामारी जैसी प्राकृतिक आपदाएँ आती है।“ हमारा क्षेत्र पहले से ही बहुत प्राकृतिक आपदायें झेल चुका है। कत्लखाने को बंद करा कर आप जनता की प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा कर सकते हैं। विश्व के सभी धर्म मांसाहार के खिलाफ हैं। डॉ बजाज द्वारा संकलित शाकाहार के बारे में सभी धर्मा की राय संलग्न है।

मांसाहार के कारण ही समाज में अपराध, अशांति, अन्याय होता है। कत्लखानों के कारण मांसाहार को बढ़ावा मिलता है। अतः समाज को अपराध, अशांति, अन्याय से बचाने के लिये, कृपया कत्लखाने को तत्काल बंद कराएं। गायत्री परिवार के संस्थापक डॉ श्री राम शर्मा द्वारा शाकाहार पर संकलित विश्व के प्रसिद्ध व्यक्तियों के विचार और अनुसंधान भी संलग्न हैं।

संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय देश भर लागू होने वाले केंद्रीय कानून के बराबर होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने १६-११-९४ को आदेश दिया था जिसका सारांश है कि “बकरीद पर गौवंश की कुर्बानी गैरकानूनी है”  इसी प्रकार २६-१०-२००५ के आदेशानुसार “गोबर कोहिनूर से कीमती है।“ और “गौरक्षा संवैधानिक कर्तव्य है और गौ-हत्या संवैधानिक अपराध है।“ अतः आपश्री से नम्र निवेदन है कि कृपया अपनी जिले में एक भी गौवंश की कुर्बानी/हत्या न होने दें। सर्वोच्च न्यायालय में स्वर्गीय राजीव दीक्षित द्वारा की गई बहस का सारांश भी संलग्न है। 

बिहार के गौरव – भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद भी हृदय से गौरक्षा चाहते थे। बिहार के चंपारण से स्वतन्त्रता आंदोलन की शुरुआत करने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी गौरक्षा को भारत की जनता के लिए स्वतन्त्रता से अधिक महत्वपूर्ण मानते थे। सम्पूर्ण क्रांति के महानायक लोकनायक जयप्रकाश नारायण का विचार था – मेरे विचार से भारत की वर्तमान परिस्थिति में गोहत्या निषेध से बढ़कर कोई वैज्ञानिक तथा विवेक पूर्ण क्रिया नहीं है” बिहार की अधिकांश जनता भी गौरक्षा + प्राणिमात्र की रक्षा चाहती है। इस समय जनतंत्र द्वारा देश संचालित है। जनतंत्र अर्थात जैसा अधिकांश जनता चाहती है, वैसा हो। इस दृष्टि से भी कत्लखाना जनतंत्र के भी विरुद्ध है।

विश्वास है आप अपने अधिकार क्षेत्र के सभी कत्लखानों को तत्काल बंद कराएंगे ही, साथी ही अपने सभी साथी अधिकारियों को भी कत्लखानों के विरुद्ध कार्यवाही कर अपना संवैधानिक कर्तव्य निभाने कहेंगे।

शाकाहार – विभिन्न संप्रदायों – धर्मो के अनुसार

सनातन धर्म

प्राण चाहे कंठ तक ही क्यों न आ जायें, मांसाहार नहीं करना चाहिये।– काशीखंड ग्रंथ

मांसाहार त्यागी ही, विशेष पुण्यवान माना जाता है। – महाभारत – अनुशासन पर्व ११५

ईसा मसीह

पशु वध करने के लिए नहीं है। मैं दया चाहूँगा, बलिदान नहीं। तुम रक्त बहाना छोड़ दो, अपने मुंह में मांस मत डालो, ईश्वर बड़ा दयालु है, उसकी आज्ञा है कि मनुष्य, पृथ्वी से उत्पन्न शाक, फल, अन्न से अपना जीवन निर्वाह करे।

बौद्ध

जीवों को बचाना धर्म है, उन्हें मारना अधर्म है। मांस खाने से कोढ़ जैसे अनेक भयंकर रोग फूट पड़ते हैं, शरीर में खतरनाक कीड़े पड़ जाते हैं, अतः मांसाहार का त्याग करें।

इस्लाम

जानवरों को जीने का दुनिया में रहने का बराबर और पूरा हक है। चलने वाली चीज या जानदार, अल्लाह ने बनाई है। और सबको खाने को दिया है। जमीन उसने सारे जानदारों के लिए बनाई है। हमने बारिश को जमीन पर भेजा, जिससे तरह तरह के अनाज, अंगूर, फल-फूल, हरियाली व घाँस उगती है। ये सब खाने के लिये दिये हैं, तुम्हारे और तुमहरे जानवरों के लिये। कुदरत को बर्बाद मत करो।

पारसी

जो व्यक्ति मांस, मछ्ली और शराब का सेवन करता है, उसके धर्म, कर्म, जप, तप, सब नष्ट हो जाते हैं। जिनको जिंदा नहीं कर सकते फिर क्यों किसी को मारना?

यहूदी

पृथ्वी के हर पशु को और उड़ने वाले पक्षी को तथा उस हर प्राणी को जो धरती पर रेंगता है, जिसमे जीवन है, उन सबके लिये मैंने मांस की जगह हरी पत्ती दी है। जब तुम प्रार्थना करते हो, तो मैं उसे नहीं सुनता, यदि तुम्हारे हाथ खून से रंगे हैं।

शिन्तो

निरीह कीडियों और मकोड़ों की रक्षा करें, जो दया करते हैं, उनके आयु बढ़ती है।

कन्फूशियस

मनुष्य मुख्यतः मांस, मदिरा और वासना जनित सुखों की ओर दौड़ता है, किन्तु जो धर्म में परिपूर्ण होना चाहते हैं, वह ऐसे भोजन आदि की इच्छा नहीं करता।

जैन

अहिंसा परम धर्म है। हिंसा करने वाले का सब धर्म कर्म व्यर्थ हो जाता है। अतः किसी भी जीव की हिंसा मत करो। संसार में सबको अपनी जान प्यारी है, कोई मरना नहीं चाहता। अतः किसी भी प्राणी की हिंसा मत करो।

डॉ मुज्जफर हुसैन द्वारा लिखित “इस्लाम और शाकाहार” पुस्तक से डॉ मदन मोहन बजाज द्वारा संकलित 

शाकाहार-मांसाहार वैज्ञानिक विवेचन

(“निरोग जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र”, लेखक आचार्य श्री राम शर्मा से सभार)

डॉरटर हेग: “शाकाहार से शक्ति उत्पन्न होती है और मांस खाने से उतेजना बढ़ती है। परिश्रम के अवसर पर मांसाहारी जल्दी थक जाता है।  सिर दर्द, उदासी, स्नायु, दुर्बलता, निराशाग्रस्त और आत्महत्या की प्रवृत्ति के बहुघा शिकार हो जाते हैं।”

अमेरिकन डॉक्टर शिरमेट – “शाकाहार पर रहने वालो को टाइफाइड बहुत कम होता है। ”

डॉक्टर कलार्दसन : “जिन बच्चों को मांस खिलाया जाता है, वे बड़े होने पर सुस्त, आलसी, झेंपू और दुर्बल होते है। उनके लिए अन्न, शाक और धुप ही सर्वोत्तम आहार है। ”

डॉक्टर मेनरी पडरो: ” मुझे पक्का विश्वास हो गया है कि मांस खाने वाले की अपेक्षा अन्न खाने वाले बहुत कम बीमार पड़ते है एवं पड़ते भी है तो अपेक्षाकृत जल्दी ठीक हो जाते हैं। ”

डॉक्टर पार्कस:”मांसाहार के कारण ही वे बहुत दिनों सर दर्द, मानसिक थकावट व् गठिया से ग्रसित रहे।”

डॉक्टर ब्राउन : ” यह सम्भव है कि कोई मांसाहारी इस अमानुषिक भोजन के दुष्प्रभाव से कुछ दिन ही बचा हो, पर देर-सवेर उसका प्रभाव प्रकट हो कर रहेगा। जिगर एवं गुर्दे में खराबी होना तथा क्षय कैंसर, गठिया आदि रोगों में बहुघा मांसाहार ही प्रधान कारण होता है। “

डॉक्टर रसेल : “जहाँ मांसाहार जितना कम होता है, वहाँ कैंसर की बीमारी भी उतनी ही कम होगी।“

डॉक्टर लक्सशैम: “अपेंडीसाईटिस की बीमारी, मुख्यता मांसाहार के कारण ही होती है। “

डॉ एच चिर्रीठन: “मांसाहार के पक्ष में यह दलील थोथी है कि उससे हमें प्रोटीन प्राप्त होने के कारण ताकत बढ़ती है। जितनी प्रोटीन की हमें आवश्यकता है उतनी शाकाहार से आसानी से मिल सकती है। मांस द्वारा जो अनावश्यक प्रोटीन प्राप्त किया जाता है, वह अत्यंत हानिकारक सिद्ध होता है।”

विज्ञानं विशेषज्ञ: “मांस, अन्न की अपेक्षा कम पौष्टिक है। वह अनावश्यक ही नहीं, हानिकारक भी है। इससे शारीर आलसी बनता है और दांतो के जड़े कमज़ोर हो जाती है। रक्त विकार कैंसर गठिया और उन्माद सरिखें अनेको शारारिक एवं मानसिक रोगों के इससे उत्पत्ति होती है। 

लन्दन में १००० मनुष्यों पर किये गए अनुसन्धान का निष्कर्ष :

मांसाहारियों की अपेक्षा शाकाहारी लोग अधिक श्रम करते हैं। कम बीमार पड़ते हैं और दीर्घजीवी होते है। मांसाहारी अनेक उद्दण्ड  क्रोधी, मंद बुद्धि एवं अपराधी मनोवृत्ति के पाए गए हैं। 

जॉर्ज बर्नार्ड शौ : “अपने कुटुम्बियों को मारकर खा जाना और पशुओं का मांसाहार करना बराबर है।”

विशेषज्ञ एच.एम.सिंकलेयेर: “मनुष्य फ्रूगी वोरस है, अर्थात फल एवं बीज उसका आहार है।”

  डॉक्टर जैसिका फील्ड : ” १. रोगों से मुक्त होने के लिए, २. ताकत एवं स्वास्थ्य बुढ़ापे तक स्थिर रखने के लिए, ३. रोग ग्रस्त होने से बचने के लिए, ४. स्वस्थ मस्तिष्क और क्रिया कुशल शरीर प्राप्ति के लिए लोग मांस को आहार के रूप में लेना बंद कर दें। उसी में उसकी भलाई है।“

प्रोफेसर वेल्स : “शाकाहार कहीं अधिक सुपाच्य सुलभ, सस्ता और अधिक पोषक तत्व से परिपूर्ण है।  मांस में सोया बीन से ३५% कम प्रोटीन होता है।  दालों में प्रोटीन २२ से २४% व् कार्बोहायड्रेट ५५-६०% होता है एवं मांस में १३-१८% प्रोटीन व् कार्बोहायड्रेट नगण्य होता है।  मांस में ४-१३% चिकनाई होती है जबकि गाय के घी में ७८% होती है।“

डॉ. अर्नेस्ट क्रासकी: “मांसाहारी प्राणियों की आंत १० फुट एवं मनुष्य की आंत ४८ फुट लम्बी होती है। भोजन पचने, मल विसर्जन में २४ घंटे लगते हैं। किन्तु मांस ८-१० घंटे में सड़ने लगता है एवं यह सडांध अनेक रोगों को पैदा करने का कारण बनती है।“

प्रो शिरफिस्म : “मांसभक्षी भी उसी प्रकार कि सडांध से भरा रहता है जैसे कोई कब्र।“

डॉ जेन ओल्ड फील्ड : “उच्च कोटि का तथा सभ्यतापूर्ण जीवन व्यतीत करने के लिए आमिष भोजन को त्याग कर निरामिष भोजन अर्थात फलाहार करना चाहिए। “घोड़े से बनाये गए सीरम का उपयोग करने वाले रोगी, बड़ी मात्रा में लकवे के शिकार हुए हैं।“ “रोम कि विश्व विजयी सेना के अधिकांश सैनिक शाकाहारी थे।“

प्रो हचर्ड : “पशु मांस कोई खाद्य नहीं है, अपितु एक भयंकर विष है।”

डॉ पॉल कर्टेन : “दीर्घकाल तक मांस भक्षी बने रहने के लिए निःसंदेह अत्यधिक कठोर ह्रदय की आवश्यकता है।” -८-३२ 

हैरिस ग्रिरेल : “मांसाहारी की तुलना में शाकाहार १० वर्ष अधिक जी सकता है।”

डॉ राल्फ विचर: “आस्तिया पोरासिस नामक बीमारी अधिकांशतः मांसभक्षीयों को ही होता है। “

मांसाहार शाकाहार की अपेक्षा २० गुना अधिक महंगा पड़ता है। 

“हिटलर कि सेना में अधिकतर लोग पेप्टिक अल्सर, अमाशय शोथ के शिकार थे। युद्ध बंदी के रूप में उन्हें मांस, अंडा, मक्खन, १२५ ग्राम शक्कर की जगह गेंहू की रोटी, बंदगोभी का सूप, मकई, जई और सोया बीन का दलिया  दिया जाता था। इससे वे परंपरागत रोगों से मुक्त हो गए। पुनः मांस मैदा, नमक, चीनी, लेने से वैसे ही रोग ग्रस्त हो गए।”

स्वीडन के वैज्ञानिको द्वारा १५ युवको पर परिक्षण का परिणाम :

१. मासाहार पर ३ दिन रखा। ६० मिनट बिना थके साइकिल चला सके। 

२. मिश्रित आहार पर। रक्षा  १०४ मिनट चला सके। 

३. पूर्ण शाकाहार पर ३ दिन रखा. १४० से १६० मिनट बिना थके साइकिल चला सके। 

 

डेनमार्क : प्रथम विश्व युद्ध – खाद्य संकट के कारण डॉक्टर हिन्द हैट के सुझाव अनुसार अक्टूबर १९१७ से १९१८ पूरे देश ने शाकाहार को स्वीकार किया। परिणाम- सबसे कम मृत्यु दर एवं रोगियों की संख्या नगण्य हो गयी। ८५% हार्ट अटैक, ब्लड प्रेशर का उपचार शुद्ध शाकाहार भोजन प्रणाली अपनाकर किया जा सकता है। १८९९- क्वेटा में मांस भोजी अँगरेज़ सिपाहियों एवं शाकाहारी सिख रेजिमेंट में रस्साकशी करायी गयी।  अँगरेज़ सिपाहियों के हाथ छील गए। उन्हें रस्सा छोड़ना पड़ा। सिख जवानो की जीत हुई। 

डॉ जॉन ग्रेनर: “मांसाहार ह्रदय रोग का एक प्रमुख कारण है।” १९९८: जर्मनी में २० व्यक्तियों की ७० मील चलने की रेस हुई। १४ मांसाहारी, ६ शाकाहारी ने भाग लिया।  १३ मांसाहारी ३५ मील चलकर शिथिल हो गए। सारे शाकाहारी गंतव्य स्थान तक पहुंचे। ७० वर्षीया जे ब्रैंसन को सरकार ने सैनिको को शाकाहार की शिक्षा देने के लिए नियुक्त किया। ८ दिनों तक साइकिल चलायी, फिर भी स्वस्थ रहे। 

मांस भोजी जानवरों का मांस विषैला हो जाता है। इसी कारण मांसाहारी पशुओं को मनुष्य नहीं खाता। इसी प्रकार मांसाहारी मनुष्य के शरीर में भी विषैले तत्व पैदा हो जाते हैं। 

डॉ अ. वॉचमन + डॉ डी. एस. बर्नस्टीव: “शाकाहारियों के दांत चौड़े + चपटे एवं पंक्ति बद्ध होते हैं ताकि आहार को ठीक से पीस कर निगलने योग्य बना सके। मांसाहारी के जबड़े, दांत खड़े एवं नुकीले औज़ार सामान अलग-अलग रहते हैं। मांसाहारियों के नाखून नुकीले होते हैं।  मांसाहारी रात में देख सकते हैं पर शाकाहारी नहीं देख सकते हैं. मांसाहारी जीभ से चाट कर पानी पीते हैं। इनकी जीभ लम्बी वह खुरदुरी होती है। शाकाहारी की जीभ छोटी होती है। मांसाहारी मुंह से सांस लेते हैं, शाकाहारी नाक से, मांसाहारी के पसीने नहीं निकलता हैं।

डॉ जेम्स ऑस्टर फील्ड : “मानव का पाचन तंत्र १०० वर्षों तक काम करने लायक बना है। मांस जैसी अखाद्य चीज़ें खाकर उसे इस अवधि के पूर्व ही खराब कर, नष्ट कर दिया जाता है।

शिकागो पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट: “अधिकतर अपराध कसाई धरो के कार्य में लगे व्यक्तियों द्वारा ही किया जाता है। इस घृणित पेशे को करते-करते उन लोगों की समस्त सदवृत्तियाँ कुंठित हो जाती है और तब वे अक्सर, अवसर आने पर, मनुष्यों पर छुरी फेरने से नहीं हिचकिचाते।“

विद्वानो का मत है कि संसार में फैले दुराचार, दुर्भाव, स्वार्थ और संघर्ष का ८०% उत्तरदायित्व मांसाहार पर ही है। जिसे मनुष्य चाव से ग्रहण कर अपनी नैतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय हानि कर रहा है। सामाजिक सुख-शांति और मानवता के मंगल के लिए आवश्यक है कि संसार में मांस भोजन की प्रथा को उठा दिया जाये। प्राणियों की रक्त में मिला लोहा दुष्पाच्य होता है और आसानी से मानव रक्त में नहीं घुल पाता। जबकि वनस्पतियों में रहने वाला लोहा सरलता पूर्वक हमारी शारीर के खून में घुल जाता है।  “मछली में मांस से कुछ अधिक कैल्शियम होता है। किन्तु रोटी से अधिक नहीं।

“डॉ एडवर्ड सौंडर्स: “आनेवाली दुनिया मांसाहार के नाम मात्र से भयभीत हो उठेगी। भावी युग के लोगों को शाकाहार के लिए बाध्य होना पड़ेगा।“ कारण सैकड़ों बीमारियां हो जाती है। 

डॉ वॉचमन + डॉ बर्नस्टीव (लंदन) : “मांसाहारी व्यक्ति की हड्डियां कमज़ोर होती चली जाती है।”

डॉ एलेग्जेंडर हेग: “मांस से ४-५० ग्रेन विष पाया जाता है जिनके कारण सैकड़ों बीमारियां हो जाती है। 

भारत में ७१.३% मनुष्य शाकाहारी है। १९% यदा कदा मांसाहार करते हैं। अमेरिका में लाखों लोग मांसाहार त्याग कर शाकाहार अपना चुके हैं। १०० वर्षों तक जीने का सबसे आसान उपाय है, किसी भी तरह शराब, मांस, केक व् ऐसी मिठाइयां को न खाएं तथा नित्य प्रातः एक गिलास जल अवश्य ग्रहण करें। 

गायों का महत्व ( राजीव भाई दीक्षित एवं सुप्रीम कोर्ट वार्ता पर आधारित अंश )

  पहले आप सब ये जान ले कि भारत में ३६०० कत्लखाने ऐसे हैं जिनके पास गाय काटने का लाइसेंस है। इसके अलावा ३६००० कत्लखाने गैरकानूनी चल रहे हैं। प्रतिवर्ष ढाई करोड़ गायों का क़त्ल किया जाता है। एक से सवा करोड़ भैंसो का, और से करोड़ सूअरों का; बकरेबकरियां, मुर्गेमुर्गियां आदि छोटे जानवरों की संख्या भी करोड़ो में है। गिनी नहीं जा सकती। तो भारत एक ऐसा देश बन गया है जहाँ क़त्ल ही क़त्ल होता है। ये सब जब उनको सहन नहीं हुआ, तब सन १९९८ में राजीव भाई और राजीव भाई जैसे कुछ समविचारी लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा किया। भारत में एक संस्था है, अखिल भारतीय गौ सेवक संघ, जिससे राजीव भाई जुड़े हुए थे। इस संस्था का मुख्य कार्यालय राजीव भाई के शहर वर्धा में है। एक दूसरी संस्था है उसका नाम है अहिंसा आर्मी ट्रस्ट तो दोनों ने सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दाखिल किया और बाद में पता चला कि गुजरात सरकार भी मुक़दमे में शामिल हो गयी।

सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा किया गया कि गाय और गोवंश की हत्या नहीं होनी चाहिए। तब सामने बैठे कसाई लोगो ने कहा क्यों नहीं होनी चाहिए? जरूर होनी चाहिए। राजीव भाई की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में अपील की गयी कि ये एकदो जज का मामला नहीं है। इसमें बड़ी बेंच बनायीं जाये। साल तो सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया। बाद में मान लिया कि चलो इसके लिए कोंस्टीटूशनल बेंच बनायीं जाएगी। भारत के थोड़े दिन पहले चीफ जस्टिस रहे श्री आर. सी. लाहोटी ने अपनी अध्यक्षता में बनायी जजों की एक कोंस्टीटूशनल बेंच से सितम्बर २००५ तक मुक़दमे की सुनवाई चली।

कसाइयों के तरफ से लड़ने वाले भारत के सभी बड़ेबड़े वकील जो ५०५० लाख तक फीस लेते हैं सभी उनके पक्ष में थे। राजीव भाई के तरफ से लड़ने वाला कोई बड़ा वकील नहीं क्योंकि फीस देने को इतना पैसा नहीं। राजीव भाई ने अदालत से कहा कि हमारे पास तो कोई वकील नहीं है तो क्या करेंगे? तो अदालत ने कहा कि हम अगर आपको वकील दें तो राजीव भाई ने कहा, बड़ी मेहरबानी होगी या फिर आप हमें ही बहस का मौका दे दें तो भी बड़ी मेहरबानी होगी। तो उन्होंने कहा कि हाँ आप ही बहस कर लीजिये। हम आपको एम एस्युरि देंगे यानि कोर्ट के द्वारा दिया गया वकील। केस लड़ना शुरू किया।

मुक़दमे में कसाइयों द्वारा गाय काटने के लिए वही सारे कुतर्क रखे गए जो कभी शरद पवार द्वारा बोले गए या इस देश के ज्यादा पढ़े लिखे लोगों द्वारा बोले जाते हैं। जो देश के पहले प्रधान मंत्री नेहरू द्वारा कहे गए थे।

कसाइयों का पहला कुतर्क : गाय जब बूढी हो जाती है तो बचाने में कोई लाभ नहीं है। उसे क़त्ल करके बेचना ही बढियां है। हम भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत बना रहे हैं क्योंकि गाय का मांस एक्सपोर्ट कर रहे हैं।  दूसरा कुतर्क:

भारत में गाय के चारे की कमी है। भूखी मरे इससे अच्छा ये है कि हम उसका क़त्ल करके बेचें।  तीसरा कुतर्क: भारत में लोगों को रखने की जमीन नहीं है तो गायों को कहाँ रखे? चौथा कुतर्क: इससे विदेशी मुद्रा मिलती है।  सबसे खतरनाक कुतर्क जो कसाइयों की तरफ से दिया गया कि गाय की हत्या करना हमारे धर्म इस्लाम में लिखा हुआ है (this is our religious right). कसाई लोग कौन है? आप जानते हैं? मुसलमानो में एक कुरैशी समाज है जो सबसे ज्यादा जानवरों की हत्या करता है। उनकी तरफ से यह कुतर्क आये। राजीव भाई की तरफ से बिना क्रोध प्रकट बहुत ही धैर्य से इन सब कुतर्को का तर्कपूर्वक जवाब दिया गया।

उनका पहला कुतर्क था मांस बेचते हैं तो देशी को आमदनी होती है।  तो राजीव भाई ने सारे आंकड़े सुप्रीम कोर्ट में रखे कि एक गाय को जब काट देतें हैं तो उसके शरीर में से कितना मांस निकलता है? कितना खून निकलता है? कितनी हड्डियां निकलती है? एक स्वस्थ गाय का वजन से साढ़े क्विंटल होता है। उसे जब काटते हैं तो उसमें से मात्र ७० किलो मांस निकलता है। एक किलो गाय का मांस जब भारत से निर्यात होता है तो उसकी कीमत है लगभग ५० रुपये। तो ७० किलो का ५० से गुणा करने पर ३५०० रुपये होता है।  खून जो निकलता है लगभग २५ लीटर होता है। जिसमें कुल कमाई १५०० से २००० होती है। फिर हड्डियां निकलती है। वो भी ३०३५ किलो है जो १०००१२०० के लगभग बिक जाती है। तो कुल मिलकर एक गाय का जब क़त्ल करें और मांस, हड्डियों, खून समेत बेचे तो सरकार को या क़त्ल करने वाले कसाई को ७००० से ज्यादा नहीं मिलता। फिर राजीव भाई द्वारा कोर्ट के सामने उलटी बातें रखी गयी। हमने क़त्ल किया तो ७००० मिलेगा और जिन्दा रखा तो कितना मिलेगा? तो उसका जोड़ यह है।  एक स्वस्थ गाय एक दिन में १० किलो गोबर देती है और ढाई से लीटर मूत्र देती है। गाय के एक किलो गोबर से ३३ किलो खाद बनती है। जिसे जैविक खाद कहते हैं। तो कोर्ट ने कहा how is it possible? राजीव भाई ने कहा कि आप समय दीजिये और स्थान दीजिये। हम आपको यही सिद्ध करके बताते हैं। जब कोर्ट ने आज्ञा दी तो राजीव भाई ने उनको पूरा करके दिखाया और कोर्ट से कहा कि आई. आर. सी के वैज्ञानिक को बुला लो और टेस्ट करवा लो। तब गाय का गोबर भेजा गया टेस्ट करने के लिए। अनेक ने कहा कि इसमें १८ पोषक तत्व हैं जो सभी खेत की मिटटी को चाहिए। जैसे मैग्रीज़, फॉस्फोरस, पोटासियम, कैल्शियम, आयरन, कोबाल्ट, सिलिकॉन, आदि आदि। रासायनिक खाद में मुश्किल से तीन होतें है। तो गाय का खाद रासायनिक से १० गुना ज्यादा ताकतवर है यह तर्क कोर्ट ने माना।

राजीव भाई ने कहा अगर आपके प्रोटोकॉल के खिलाफ जाता हो तो आप चलिए हमारे साथ और देखिये कहाँकहाँ हम किलो गोबर से ३३ किलो खाद बना रहे हैं। कहा मेरे अपने गाँव में मैं बनाता हूँ।  मेरे मातापिता दोनों किसान है। पिछले १५ साल से हम गोबर के खाद से ही खेती कर रहे हैं। किलो खाद का भाव  अंतर्राष्ट्रीय बाजार में रुपये है। तो रोज १० किलो गोबर से ३३० किलो खाद बनेगी जिसे रुपये किलो के हिसाब से बेचें तो १८००२००० रुपये रोज के। गाय के गोबर देने में कोई संदेह नहीं होता। हर दिन मिलता है। तो साल में कितना? १८०० का ३६५ से गुणा कर लें। गाय की सामान्य उम्र २० साल है और वो जीवन के अंतिम दिनों तक गोबर देती है। अगर १८०० गुणा ३६५ गुणा २० कर लें तो करोड़ से ऊपर तो  केवल गोबर से मिल जाएगा। हज़ारों लाखों वर्ष पहले हमारे शास्त्रों में लिखा है कि गाय के  गोबर में लक्ष्मी जी का वास है। मैकाले के मानस पुत्र जो आधुनिक शिक्षा से पढ़कर निकले हैं, जिन्हे अपना धर्म, संस्कृति, सभ्यता सब पाखण्ड ही लगता है, हमेशा इस बात का मजाक उड़ाते हैं कि गाय के गोबर में लक्ष्मी? तो यह उन सबके लिए हमारा उत्तर है। क्योंकि यह बात सिद्ध होती है कि गाय के गोबर से खेती कर, अनाज उत्पादन कर, धन कमाया जा सकता है और पूरे भारत का पेट भरा जा सकता है।

अब बात करते हैं गोमूत्र की। रोज का दोसवा दो लीटर तो होता ही है। इससे औषधियां बनती हैंडायबिटीज, arthritis, bronchitis, bronchial asthma, tuberculosis, osteeomyelities, आदि ४८ रोगों की औषधियां बनती है। गाय के मूत्र की बाजार में दवा के रूप में कीमत ५०० रु है। वो भी भारत के बाजार में। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तो इससे भी ज्यादा है। आपको मालूम है? अमेरिका में गौमूत्र पेटेंटड है। और अमेरिका सरकार हर साल भारत से गाय का मूत्र इम्पोर्ट करती है और कैंसर और डाईबेटिस की मेडिसिन बनाती है। अमेरिका में गोमूत्र पर नहीं, नहीं, बल्कि पेटेंट है। तो गाय के मूत्र से लगभग रोज की ३००० की आमदनी बनती है। एक साल का ३००० गुणा ३६५ बराबर १०९५०००. २० साल का ३०० गुना ३६५ गुना २० बराबर २१९००००० इतना तो गाय के गोबर और मूत्र से ही हो गया।

इसी गाय के गोबर से एक गैस निकलती है जिसे मीथेन कहते हैं। मीथेन वही गैस है जिससे आप अपने रसोई घर का सिलिंडर चला सकते हैं और जरुरत पड़ने पर पहियों वाली गाडी भी चला सकते हैं। जैसे एल. पी. जी. गैस से गाड़ी चलती है वैसे मीथेन गैस से भी गाड़ी चलती है। जब न्यायधीश को विश्वास नहीं हुआ तब राजीव भाई ने कहा  अगर आप आज्ञा दे तो आपकी कार में मीथेन गैस का सिलिंडर लगवा देते हैं। आप चलाकर देख लीजिये। उन्होंने आज्ञा दी और राजीव भाई ने सिलिंडर लगवा दी। जब जज साहब ने महीने गाड़ी चलायी तब उन्होंने कहा excellent. क्योंकि खर्च आता है मात्र ५० से ६० पैसे प्रति किलोमीटर जबकि डीजल से आता है रु किलोमीटर। मीथेन गैस से गाड़ी चले तो धुंआ बिलकुल नहीं निकलता है। डीजल से चले तो धुंआ ही धुंआ। मीथेन से चलने वाली गाडी शोर भी बिलकुल नहीं करती।

तो ये सब जज साहब के समझ में गया। फिर हमने कहा रोज का १० किलो गोबर इकठ्ठा करें और उसका ही इस्तेमाल करें तो एक साल में कितनी मीथेन गैस निकलती है ? २० साल में कितनी मिलेगी? भारत में १७ करोड़ गाय हैं। सबका गोबर एक साथ इकठ्ठा करें और उसका ही इस्तेमाल करें तो लाख ३२ हज़ार करोड़ की बचत इस देश को होती है। पूरे देश का ट्रांसपोर्टेशन बिना डीजल, बिना पेट्रोल के चला सकते हैं। अरब देशों से भीख मांगने की जरुरत नहीं और पेट्रोलडीजल खरीदने के लिए अमेरिका से डॉलर खरीदने की जरुरत नहीं। अपना रुपया भी मजबूत!

  जब इतने सारे कैलकुलेशन राजीव भाई ने कोर्ट के सामने रखे तो सुप्रीम कोर्ट के जज साहब ने मान लिया कि गाय की हत्या करने से ज्यादा उसको बचाना आर्थिक रूप से लाभकारी है। जब कोर्ट की यह ओपिनियन आई तो ये मुस्लिम कसाई भड़क गए। उनको लगा कि अब केस उनके हाथ से गया। क्योंकि उन्होंने कहा था कि गाय का क़त्ल करो तो ७००० की इनकम है। लेकिन इधर राजीव भाई ने सिद्ध कर दिया कि क़त्ल करो तो लाखों करोड़ों की इनकम है। फिर उन्होंने अपना ट्रम कार्ड खेला। उन्होंने कहा कि गाय का क़त्ल करना हमारा धार्मिक अधिकार है (this is our religious right.) राजीव भाई ने कोर्ट में कहा अगर ये इनका धार्मिक अधिकार है तो इतिहास में पता करो कि किसकिस मुस्लिम राजा ने अपने इस धार्मिक अधिकार का प्रयोग किया? इस पर कोर्ट ने कहा ठीक है एक कमीशन बैठाओ, हिस्टोरियन को बुलाओ और जितने मुस्लिम राजा भारत में हुए सबकी हिस्ट्री निकालो, दस्तावेज निकालो। किसकिस राजा ने अपने इस धार्मिक अधिकार का पालन किया यह पता लगाया जाये।

पुराने दस्तावेज जब निकले तो उससे पता चला कि भारत में जितने भी मुस्लिम राजा हुए, एक ने भी गाय का क़त्ल नहीं किया। इसके विपरीत कुछ राजाओं ने गायों के क़त्ल के खिलाफ कानून बनाये। उनमे से एक का नाम था बाबर। बाबर ने अपने पुस्तक बाबरनामा में लिखवाया है कि मेरे मरने के बाद भी गाय को क़त्ल न करने का कानून जारी रहना चाहिए। तो उसके पुत्र हुमायु ने भी उसका पालन किया और उसके बाद जितने मुग़ल राजा हुए सबने इस कानून का पालन किया। including औरंगज़ेब !

फिर दक्षिण भारत में एक राजा था हैदर अली, टीपू सुलतान का बाप। उसने एक कानून बनवाया था कि अगर कोई गाय की हत्या करेगा तो हैदर उसकी गर्दन काट देगा और हैदर अली ने ऐसे सैकड़ो कसाइयों की गर्दन काटी थी जिन्होंने गाय को काटा था। फिर हैदर अली का बेटा आया टीपू सुलतान तो उसने कानून को थोड़ा हल्का कर दिया। उसने कानून बना दिया कि हाथ काट देंगे। तो टीपू सुलतान के समय में कोई भी अगर गाय काटता था तो उसका हाथ काट दिया जाता था। ये सब दस्तावेज जब कोर्ट के सामने आये तो राजीव भाई ने जज साहब से कहा कि आप ज़रा बताइये अगर इस्लाम में गाय का क़त्ल करना धार्मिक अधिकार होता तो इन्होने क्यों नहीं गाय का क़त्ल करवाया? बाबर तो कट्टर इस्लामी था। वक्त की नमाज़ पढ़ता था। हुमायु और औरंगज़ेब तो ज्यादा कट्टर था। तब गाय का क़त्ल रोकने के लिए क्यों कानून बनवाए गए? क्यों हैदर अली ने कहा कि वो गाय का क़त्ल करने वाले के हाथ काट देगा?

राजीव भाई ने कोर्ट में कहा कि कुरआन शरीफ, हदीस, आदि जितनी पुस्तक है हम उन्हें कोर्ट में पेश करते हैं और कहाँ लिखा है गाय का क़त्ल करो ये जानना चाहते हैं। और आपको पता चलेगा कि इस्लाम की कोई भी पुस्तक में नहीं लिखा है कि गाय का क़त्ल करो। हदीस में तो लिखा हुआ है कि गाय की रक्षा करो क्योंकि वह तुम्हारी रक्षा करती है। पैगम्बर मुहम्मद साहब का कहना है गाय अबोल जानवर है इसलिए उस पर दया करो और एक जगह लिखा है गाय का क़त्ल करोगे तो दोजख में भी जमीन नहीं मिलेगी। राजीव भाई ने कोर्ट से कहा अगर कुरान यह कहती है तो फिर ये गाय का क़त्ल धार्मिक अधिकार कब से हुआ? पूछो इन कसाइयों से! कसाई बौखला गए। राजीव भाई ने कहा अगर मक्का मदीना में भी कोई किताब हो तो ले आओ उठा के!

अंत में कोर्ट ने उन्हें महीने का परमीशन दिया कि जाओ और दस्तावेज ढूंढ कर लाओ जिसमें लिखा हो गाय का क़त्ल इस्लाम का मूल अधिकार है। एक महीने तक कोई भी दस्तावेज नहीं मिला। कोर्ट ने कहा अब हम ज्यादा समय नहीं दे सकते। और अंत २६ अक्टूबर २००५ गया।

सुप्रीम कोर्ट ने एक इतिहास बना दिया और उन्होंने कहा कि “ गाय को बचाना संवैधानिक कर्तव्य है और गाय को काटना संवैधानिक अपराध है।“ सरकार का तो है ही, नागरिक का भी है। अब तक जो संवैधानिक कर्तव्य थे जैसेसंविधान का पालन करना, राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करना, क्रांतिकारियों का सम्मान करना, देश की एकता और अखंडता को बनाये रखना आदि; अब इसमें गौ की रक्षा भी जुड़ गयी है।

  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत की ३४ राज्यों की सरकार की जिम्मेदारी है कि वे गाय का क़त्ल अपनेअपने राज्य में बंद कराये और किसी राज्य में अगर गाय का क़त्ल होता है तो उस राज्य  के मुख्यमंत्री, राज्यपाल और चीफ सेक्रेटरी की जिम्मेदारी है। वे अपना काम पूरा नहीं कर रहे तो यह राज्यों के लिए संवैधानिक जवाबदारी है और नागरिको के लिए संवैधानिक कर्तव्य।

  कानून दो स्तर पर बनाये जाते हैं। एक जो केंद्र सरकार बना सकती है और एक ३५ राज्यों की राज्य सरकार बना सकती है, अपनेअपने राज्यों में। अगर केंद्र सरकार ही बना दे तो किसी राज्य सरकार को बनाने की जरुरत नहीं। केंद्र सरकार का कानून पूरे देश में लागू होगा। तो आप सब केंद्र सरकार पर दबाव बनायें। दबाव कैसे बनता है? आपको हज़ारों, लाखों की संख्या में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या राज्यों के मुख्यमंत्री को पत्र लिखना है और इतना ही कहना है कि २६ अक्टूबर २००५ को जो सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट आया है, उसे लागू करो। आप अपने आसपड़ोस, गलीमोहल्ले, शहर के लोगों से बात करना शुरू करें और उन्हें गाय का महत्व समझाए। देश के लिए गाय की आर्थिक योगदान बताएं। उन्हें भी देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री को पत्र लिखने का निवेदन करें। इतना दबाव डालें कि २०१४ के चुनाव में लोग उसी सरकार को वोट दे जो गौहत्या के खिलाफ इस जजमेंट को पूरे देश में लागु करे।

  अंततःक्रन्तिकारी मंगल पांडे इतिहास बनाकर फांसी पर चढ़ गया लेकिन गाय की चर्बी के कारतूस उसने अपने मुंह से नहीं खोले। जिस अँगरेज़ अधिकारी ने उसको मजबूर किया उसको मंगल पांडे ने गोली मार दी। इसलिए हम कहते है कि हमारी तो आज़ादी का इतिहास शुरू होता है गौरक्षा से। अर्थात गाय की रक्षा उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी हमारी आज़ादी।